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POEM

Updated: Aug 2, 2020

तुम्हारा कोई अधिकरि नहीं ।


छोड़ कर अपना आंगन तेरे घर वो आई थी

बाबुल की वो चिड़िया अब परदेसी सी पराई थी।


सात फेरो को पुरा कर वचन जनम-जनम का तुमने दिया

फिर क्यो अपनी अर्धांगनी को तुमने हैवानियत से नग्न किया?


लक्ष्मी,काली दुर्गा का रुप कहते हो पत्नी को,

फिर क्यों ना पूजते,पर नोचते हो अपनी अर्धांगनी को ?


अरे! दहेज के लिये जान लेने मे भी ना तुमने कोई कसर छोडी ।

"क्या दिया है तेरे बाप ने" ये कहकर तुने फिर आज है उसकी कलाई मोड़ी!


वो तो छोड़ अपना जहाँ तेरे जहान को अपनाने आई थी ,

उसका ना तो मायेका रहा, ससुराल तो खैर पीर पराई थी ।


रो-रो कर घुट-घुट कर भी तुमको पति पर्मेश्वर बुलाती है ,

संस्कृति का डर नहीं ;

समाज के तानो से हर रोज वो सहम जाती है ।


छोड़ कर भी जो जाए तुम्हें कौन डगर वो जाएगी ?

तलाक के बाद ये डूबता समाज,

क्या उसे वही सम्मान दे पायेगी?


वो पति पर्मेश्रवर हैवान बन उसके बदन को नोचता खरोचता है

मर्दानगी का चोला पहन उसकी आत्मा को तोडता निचोड़ता है।


फिर भी कहते हो चुप रहो, ये तो होता रहता है ।

बेटा वो तो तेरा पति है,चुपचाप सह ले यही इतिहास कहता है ।


चीख्ती-पुकारती जब माँ-बाबा के पास गई,

तो माँ ने भी यही कहा ये सब तो मैने भी सही ।

ऐसे जो घर संसार तू अपना उजाड़ेगी

ये अन्धा समाज तुझे तानो से मार डालेगा।


टूट गई वो, बिखर गई

बाबुल की चिडियाँ अब जाके आज़ाद हूई ।

क्योकि उसका ना तो मयेका ससुराल तो खैर पीर पराई थी।

चुपचाप वो क्यों सहे ?

अब इतिहास बदलने की बारि आई थी ।।


लड़ती रही वो अकेले जीतती रही वो हर जंग ,

आज नहीं है वो तन्हा जुड़े हैं उससे हजारों रंग ।।


तुम्हारी देह, तुम्हारी काया;

इसपे नहीं किसी ने हैवनियत, हवस का हक़ पाया ।

अगर एक धागा बान्ध वो तुम्हारे सम्मान को इज्जत को नोचना चाहे ,

वो पति नही बलात्कारी ही कहलाये ।।


तुम दुर्बल नही आदिस्क्ती हो ।

हे स्त्री तुम निर्मम जलधार भी हो

और आग सी जलती हो ।

कोई जुल्म तुमपे भरी ना पड़ जाए ।

घर वालो की झुटि शान पे तू पापियो का सर कुचलने से ना रह जाए।

क्योकी अब और नही कोई हैवान पर्मेश्रवर या तेरा अधिकारी है

अब इतिहास बदलने की बारि है ।

अब इतिहास बदलने की बारि है ।।


By:-

Akanksha

Maharaja agrasen college

2nd year

7827195384












 
 
 

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